मैंने तुम्हें पुकारा इतना
रात सुबह फिर शाम हो गई।
तुम निष्ठुर निर्मोही निकले
पीर प्रेम कि तुम ना जानी।
मेरे नयन तरसते रह गए
मिल ना सके तुम ओ नादानी ।
पल पल द्वार निहारा इतना
रात सुबह फिर शाम हो गई।
भूल गए तुम उन कसमो को
भूल गए तुम प्रीत पुरानी।
मैंने प्यार किया था कितना
भूल गए तुम प्रेम कहानी।
तुमने नहीं बिचारा इतना
रात सुबह फिर शाम हो गई।
क्या तुम को मालूम नहीं था
यह समाज पत्थर का दिल है।
इसने प्यार रुलाया सबका
बहुत कठिन है इसकी मंजिल है।
मांझी दूर किनारा इतना
रात-सुबह फिर शाम हो गई।
तुम कमजोर हृदय के निकले
डोर प्रेम की जुड़ ना पाए।
ऊंची नीची दीवारों को
आखिर तुम भी तोड़ ना पाए।
छोटा साथ हमारा इतना
रात सुबह फिर शाम हो गई।
प्रेम इश्क ही नहीं खुदा है
इसकी ज्योति सदा जलती है।
तन बल की मिट्टी हो जाए
आग प्रेम की ना बुझती है।
देखा नहीं नाजारा इतना
रात सुबह फिर शाम हो गई।